कुरुक्षेत्र के समरांगण में जब अर्जुन मोह और विषाद से ग्रस्त होकर धनुष रख देते हैं, तब योगेश्वर श्रीकृष्ण उन्हें 'कर्मयोग' की वह अलौकिक दृष्टि प्रदान करते हैं जो संसार के प्रत्येक कर्मशील मनुष्य का मार्गदर्शन करती है।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
१. फल की आसक्ति ही बंधन का कारण
मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, परंतु फल की रचना प्रकृति के अनेक नियमों और ईश्वरीय विधान पर निर्भर करती है। जब हम फल से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं, तब सफलता अहंकार लाती है और असफलता अवसाद।
२. योगस्थः कुरु कर्माणि
समत्वं योग उच्यते — सिद्धि और असिद्धि में समभाव ही योग है। जब कार्य को भगवान की पूजा समझकर किया जाता है, तब कर्म ही मोक्ष का साधन बन जाता है।

