परंपरा / संप्रदाय
अद्वैत वेदांत परंपरा / दशनामी संप्रदाय
ऐतिहासिक काल
788 ई. (कलाड़ी, केरल) – 820 ई. (केदारनाथ, उत्तराखंड)
मुख्य आश्रम स्थल
शृंगेरी, द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ, सम्पूर्ण भारत
आश्रम का नाम
चार आम्नाय मठ (शारदा, गोवर्धन, ज्योतिर्मठ, कालिका)
॥ दिव्य जीवन दर्शन ॥
पावन जीवन चरित्र एवं साधना
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः — केवल परब्रह्म ही परम सत्य है; आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है।
मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में भारतवर्ष के चारों कोनों में पैदल यात्रा कर सनातन धर्म का पुनरुद्धार करने वाले जगद्गुरु। उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर 'प्रस्थानत्रयी भाष्य' की रचना की तथा भारत की सांस्कृतिक एकता हेतु चार धामों में आम्नाय मठों की स्थापना की।
अमृत वचन
प्रमुख उपदेश एवं अमृत वचन
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
— आदि गुरु शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि)“भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते।”
— आदि गुरु शंकराचार्य (मोहमुद्गर)सम्बद्ध रचनाएं एवं ग्रंथ
गीता भाष्यईशावास्योपनिषद भाष्यविवेकचूड़ामणि
साधना स्थल एवं आश्रम
चार आम्नाय मठ (शारदा, गोवर्धन, ज्योतिर्मठ, कालिका)
स्थान: शृंगेरी, द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ, सम्पूर्ण भारत
