परंपरा / संप्रदाय
रामानंदी वैष्णव संप्रदाय
ऐतिहासिक काल
1511 ई. (संवत 1568) – 1623 ई. (संवत 1680)
मुख्य आश्रम स्थल
काशी (वाराणसी) एवं चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
आश्रम का नाम
तुलसी घाट, वाराणसी
॥ दिव्य जीवन दर्शन ॥
पावन जीवन चरित्र एवं साधना
श्रीराम की अनन्य दास्य भक्ति, मर्यादा का पालन, और लोककल्याणकारी धर्म का आचरण ही जीवन का परम ध्येय है।
गोस्वामी तुलसीदास जी हिंदी साहित्य और भक्ति काल के अमर शिरोमणि हैं। चित्रकूट में भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी के साक्षात दर्शन के उपरांत उन्होंने काशी के अस्सी घाट पर अमर महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' की रचना की। उन्होंने जन-जन तक अवधी भाषा में रामकथा पहुँचाकर भारतीय संस्कृति की रक्षा की।
अमृत वचन
प्रमुख उपदेश एवं अमृत वचन
“परहित सरिस धरम नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥”
— गोस्वामी तुलसीदास जी (श्रीरामचरितमानस (उत्तरकाण्ड))“सीय राम मय सब जग जानी। करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी॥”
— गोस्वामी तुलसीदास जी (श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड))सम्बद्ध रचनाएं एवं ग्रंथ
श्रीरामचरितमानसहनुमान चालीसाविनय पत्रिकाकवितावली
साधना स्थल एवं आश्रम
तुलसी घाट, वाराणसी
स्थान: काशी (वाराणसी) एवं चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
