परंपरा / संप्रदाय
निर्गुण भक्ति परंपरा / संत मत
ऐतिहासिक काल
1398 ई. (काशी) – 1518 ई. (मगहर)
मुख्य आश्रम स्थल
वाराणसी एवं मगहर, उत्तर प्रदेश
आश्रम का नाम
कबीर चौरा मठ, काशी
॥ दिव्य जीवन दर्शन ॥
पावन जीवन चरित्र एवं साधना
घट-घट में राम समाए हैं; बाह्य आडंबरों और पाखंडों से परे अंतःकरण की शुद्धि, प्रेम और सद्गुरु की कृपा से ही सत्य का बोध होता है।
काशी की पावन भूमि पर जुलाहा परिवार में पले-बढ़े संत कबीरदास जी निर्गुण भक्ति धारा के महान क्रांतिकारी संत थे। उन्होंने तत्कालीन समाज में फैले धार्मिक संकीर्णता और पाखंड पर तीखे दोहों से प्रहार किया और 'सहज समाधि' तथा अंतर्मुखी राम-सुमिरन का सरल मार्ग प्रशस्त किया।
अमृत वचन
प्रमुख उपदेश एवं अमृत वचन
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”
— संत कबीर दास जी (कबीर साखी)“मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में। ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकांत निवास में॥”
— संत कबीर दास जी (कबीर पद)सम्बद्ध रचनाएं एवं ग्रंथ
बीजक (साखी, सबद, रमैनी)कबीर ग्रंथावली
साधना स्थल एवं आश्रम
कबीर चौरा मठ, काशी
स्थान: वाराणसी एवं मगहर, उत्तर प्रदेश
