ऋषि पराशर द्वारा विरचित 'बृहत्पाराशर होराशास्त्र' में ज्योतिष को वेदों का नेत्र (चक्षु) कहा गया है। आकाश में गतिमान सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि नवग्रह हमारे सूक्ष्म अंतःकरण और प्रारब्ध से जुड़े होते हैं।
१. ग्रह फलित का मूल सिद्धांत
ग्रह मनुष्य पर कोई बाह्य अन्याय नहीं करते; वे केवल पूर्वजन्म के कर्मों की घड़ी की भांति समय पर फल का प्राकट्य करते हैं।
२. नवग्रह शांति और मंत्र जप
गायत्री मंत्र, सूर्य नमस्कार और संबंधित ग्रह के सात्विक बीज मंत्र के नित्य जप से ग्रहों का अनिष्ट प्रभाव क्षीण होकर सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।

