अयोध्या केवल एक भौगोलिक नगरी नहीं, अपितु सनातन धर्म का पावन हृदय है। वाल्मीकि रामायण में अयोध्या को साक्षात देवपुरी अमरावती के समान वैभवशाली और पुण्यमयी बताया गया है।
१. त्रेतायुग से कलियुग तक की अखंड परंपरा
महाराज मनु द्वारा संस्थापित इस पावन नगरी में सूर्यवंश के प्रतापी राजाओं ने धर्म की नींव रखी। इसी वंश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतार हुआ, जिन्होंने सत्य, त्याग और मर्यादा की वह अमर रेखा खींची जो सहस्राब्दियों से मानव चेतना को आलोकित कर रही है।
२. नागर शैली स्थापत्य की अलौकिक शोभा
अयोध्या का नवनिर्मित दिव्य मंदिर विशुद्ध पारंपरिक नागर स्थापत्य शैली (गुर्जर-प्रतिहार प्रभाव) में निर्मित है। इसमें बिना लोहे के केवल बंसी पहाड़पुर के गुलाबी बलुआ पत्थरों का प्रयोग किया गया है, जो एक हजार वर्ष से अधिक समय तक सुरक्षित रहेगा।
३. सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
यह केवल एक पाषाण मंदिर नहीं, अपितु भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान और आध्यात्मिक अस्मिता का प्रत्यक्ष प्रतीक है।

