आदि गुरु शंकराचार्य ने उपनिषदों के ऋषियों की वाणी को अद्वैत दर्शन के रूप में सुव्यवस्थित किया। जब अज्ञान का पर्दा हटता है, तब जीव को यह बोध होता है कि वह देह नहीं, अपितु नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा है।
॥ बोलो सीताराम ॥
॥ शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा ॥

॥ स्वाध्याय एवं चिंतन ॥
डॉ. विद्याधर शास्त्री • 25 अग॰ 2026 • 6 मिनट पाठ

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः — द्वैत के भ्रम से परे अखंड एकत्व का साक्षात्कार ही सनातन ज्ञान की पराकाष्ठा है।
आदि गुरु शंकराचार्य ने उपनिषदों के ऋषियों की वाणी को अद्वैत दर्शन के रूप में सुव्यवस्थित किया। जब अज्ञान का पर्दा हटता है, तब जीव को यह बोध होता है कि वह देह नहीं, अपितु नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्मा है।
॥ ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ॥
सबका कल्याण हो, सभी निरोगी एवं आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हों।